Tuesday, January 4, 2011

तन्हाई से तंग आकार

कल तन्हाई से तंग आकार,
युहीं बहुत देर तक तुम्हारा नाम पुकारती रही,
तुम्हे आवाज़ देती रही, रोती रही..
हर आवाज़ मेरी इधर उधर ठोकरें खाने के बाद
मर जा रही थीं,
मैं गुमसुम होके चुपचाप बैठ गयी
आँखों में नमी थी, दिल में दर्द,
वो दर्द जो हमेशा तुम्हे याद करने के बाद
चला आता है.
वो दर्द जिसके कारण तन्हाई में,
तुम्हे याद कर के रो भी लेती हूँ मैं.
कभी आखों से आंसू निकलते हैं,
तो कभी दिल रोता है
आखों के आंसू तो दिखाई देते हैं,
कुछ अपने, कुछ दोस्त, पास आकार सहारा देते हैं,
आंसू पोछते हैं,
हँसते हैं, हंसाते हैं मुझे
पर जब दिल रोता है
किसी को भी खबर नहीं होती
और मैं बस घुटती हुई सी रह जाती हूँ.