Tuesday, January 4, 2011

तन्हाई से तंग आकार

कल तन्हाई से तंग आकार,
युहीं बहुत देर तक तुम्हारा नाम पुकारती रही,
तुम्हे आवाज़ देती रही, रोती रही..
हर आवाज़ मेरी इधर उधर ठोकरें खाने के बाद
मर जा रही थीं,
मैं गुमसुम होके चुपचाप बैठ गयी
आँखों में नमी थी, दिल में दर्द,
वो दर्द जो हमेशा तुम्हे याद करने के बाद
चला आता है.
वो दर्द जिसके कारण तन्हाई में,
तुम्हे याद कर के रो भी लेती हूँ मैं.
कभी आखों से आंसू निकलते हैं,
तो कभी दिल रोता है
आखों के आंसू तो दिखाई देते हैं,
कुछ अपने, कुछ दोस्त, पास आकार सहारा देते हैं,
आंसू पोछते हैं,
हँसते हैं, हंसाते हैं मुझे
पर जब दिल रोता है
किसी को भी खबर नहीं होती
और मैं बस घुटती हुई सी रह जाती हूँ.

9 comments:

  1. हँसते हैं, हंसाते हैं मुझे
    पर जब दिल रोता है
    किसी को भी खबर नहीं होती
    और मैं बस घुटती हुई सी रह जाती हूँ.

    प्रेरणा जी बहुत ही गहरे जज्बात के साथ एक भावुक सी सुंदर कविता है...सुंदर प्रस्तुति. ब्लॉग का चित्र काफी मोहक है.

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  2. "पर जब दिल रोता है
    किसी को भी खबर नहीं होती"

    सच्चे और बहुत अच्छे भाव - शुभकामनाएं

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  3. प्रेरणा जी दर्द को आपने कविता में उतर दिया
    दर्द भरे भाव का सुंदर चित्रण है आपकी रचना

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  4. sahi kaha ... jab dil rota hai to kisis ko khabar nahi hote ... bahut khoobsurat rachna ...

    आपको और आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ...

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  5. "पर जब दिल रोता है
    किसी को भी खबर नहीं होती"

    नाजुक एहसासों की नाजुक सी कविता
    बहुत सुन्दर
    बधाई
    आभार

    आपको मकर संक्रांति की शुभ कामनाएं

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  6. पर जब दिल रोता है
    किसी को भी खबर नहीं होती

    बहुत बढ़िया .भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

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  7. नव-वर्ष का संकल्प भी अच्छा है .कविता प्रेरक है.
    गणतंत्र दिवस की मंगल कामनाएं.

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  8. पर जब दिल रोता है
    किसी को भी खबर नहीं होती
    अच्छी रचना

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  9. सब का तहे दिल से शुक्रिया!!!!

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